इस देश में ‘आरक्षण खत्म’ करने वाली नेता ने जीता चुनाव, विपक्ष का भी खात्मा

बांग्लादेश एक ऐसा देश है जहां आरक्षण खत्म करने के लिए स्टूडेंट्स लंबे वक्त से प्रदर्शन कर रहे थे. जिसके बाद पिछले साल अप्रैल मैं तत्कालीन बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण को खत्म करने की बात कही थी. बांग्लादेश में सिर्फ 44 फीसदी सरकारी नौकरियां गैर आरक्षित हैं. वहीं बाकी 56 फीसदी नौकरियों में आरक्षण दिया जाता है. यह 56 फीसदी आरक्षण ऐसे बंटा हुआ है।

56 में से सबसे बड़ा भाग 30 फीसदी नौकरियां बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम (1971) में लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों के लिए है.
10 परसेंट आरक्षण उन लोगों को मिला हुआ है जो बांग्लादेश के पिछड़े जिलों से आते हैं.
बांग्लादेश में महिलाओं को भी नौकरियों में 10 परसेंट आरक्षण मिला हुआ था. हालांकि इसकी भी आलोचना होती थी. क्योंकि महिलाएं महिलाएं आबादी की आधी हैं, ऐसे में मात्र 10 परसेंट आरक्षण से उन्हें कोई विशेष फायदा नहीं हो सकता था.
इसके अलावा बचा मात्र 1 परसेंट आरक्षण ऐसे लोगों को दिया जाता था, जो किसी शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे हों.
क्यों आरक्षण का विरोध कर रहे थे स्टूडेंट्स?
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के 30 फीसदी कोटे पर सवाल इसलिए भी उठाए जाते थे क्योंकि 2010 में जारी किये गए कोटे से जुड़े एक सर्कुलर में कहा गया था कि अगर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बच्चों के जरिए किसी नौकरी के 30 परसेंट पदों को पूरा नहीं भरा जा सकता और पद खाली रह जाते हैं तो ऐसे में उन पदों को दूसरे कैंडिडेट्स के जरिए नहीं भरा जाएगा. और ऐसे पदों को खाली छोड़ दिया जाएगा.
लेकिन स्टूडेंट्स का गुस्सा तब बढ़ गया जब पब्लिक सर्विस कमीशन के डाटा के अनुसार 35वें इग्जाम में स्वतंत्रता सेनानियों के कोटे के तहत जो 648 पद में से 521 पद खाली ही रह गए. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. ऐसा दशकों से ऐसा होता आ रहा था. इससे दस साल पहले 25वें बांग्लादेश सिविल सर्विसेज इग्जाम में 709 पद स्वतंत्रता सेनानी कोटे के तहत आरक्षित किए गए थे, जिसमें से 637 खाली ही रह गए थे.
इसके बाद इस पिछले साल (2018) की जनवरी में बांग्लादेश के पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन मंत्री सैय्यद अशरफुल इस्लाम ने राष्ट्रीय संसद को बताया था कि अलग-अलग मंत्रालयों और डिवीजनों में 3.59 लाख सरकारी पद खाली पड़े हुए हैं. इन्ही सब कारणों के चलते गैर आरक्षित वर्ग के छात्रों में गुस्सा बढ़ता गया और उन्होंने बांग्लादेश की राजधानी ढाका में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए.
विरोध करने वाले छात्रों की मांगें क्या थीं?
इस आरक्षण के विरोध को लेकर पिछले साल की शुरुआत में छात्र बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इकट्ठे होने शुरू हो गए थे. इन छात्रों की मुख्य मांगें थीं –
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आरक्षण का विरोध करने वाले छात्र चाहते थे कि इसे 56 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी पर ले जाया जाए.
छात्रों की मांग थी कि जो 3.59 लाख सरकारी पद खाली पड़े हुए हैं, उन्हें मेरिट के आधार पर भरा जाए.
इसके अलावा छात्र चाहते थे कि आरक्षण में जिन छात्रों को आयु सीमा में छूट मिलती है, उन्हें भी दूसरे छात्रों की आयु सीमा के बराबर लाया जाए.
इन मांगों को लेकर बांग्लादेशी छात्रों के हिंसक प्रदर्शन में करीब 100 से ज्यादा छात्र प्रदर्शन में घायल हुए थे. जिसके बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण को खत्म करने की बात संसद में कही थी. माना जा रहा है इस आश्वासन से भी उन्हें हाल ही में संपन्न हुए बांग्लादेश के चुनावों में फायदा हुआ है और वे दो-तिहाई से भी ज्यादा बहुमत से चुनकर फिर से देश की प्रधानमंत्री बनी हैं.
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(साभार :  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल )

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