शिवरात्रि किसे कहते हैं

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जीत समाचार की स्पेशल रिपोर्ट
महाशिवरात्रि का इतिहास भगवान शिव से जुड़ा है, जिसमें मुख्य रूप से इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था (जो शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक है) और समुद्र मंथन के दौरान शिव ने विष पीकर सृष्टि को बचाया था (जिससे वे ‘नीलकंठ’ कहलाए), तथा शिव के ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होने की कथाएँ शामिल हैं। यह रात अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने और आध्यात्मिक उन्नति का दिन मानी जाती है, जहां शिव का तांडव नृत्य सृष्टि-संहार का प्रतीक है।  

प्रमुख पौराणिक कथाएँ और महत्व:
  1. यह दिन शिव और पार्वती के मिलन का प्रतीक है, जो गृहस्थ जीवन और वैराग्य के संतुलन को दर्शाता है। 

  2. शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए विष पीकर अपने कंठ में धारण किया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। इस घटना में रात भर जागकर शिव को जगाए रखने की प्रथा शुरू हुई। 

  3. यह वो दिन था जब भगवान शिव स्वयं एक विशाल ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे, जिसे अज्ञान के अंधकार पर ज्ञान के प्रकाश की विजय के रूप में मनाया जाता है। 

  4. यह वो रात है जब शिव ने ब्रह्मांड के सृजन, पालन और संहार के चक्रों को दर्शाते हुए तांडव नृत्य किया था। 

ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व:
आध्यात्मिक उन्नति:
महाशिवरात्रि वह रात है जब पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध ऊर्जा के प्राकृतिक प्रवाह के लिए अनुकूल होता है, जिससे आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त करने में मदद मिलती है।

मुक्ति और ध्यान:
यह रात अज्ञान से मुक्ति, आध्यात्मिक शरण और आंतरिक अंधकार पर विजय पाने के लिए महत्वपूर्ण है। भक्त इस दिन उपवास, ध्यान और मंत्र जाप करते हैं।

ऐतिहासिक नृत्य उत्सव:
कोणार्क और खजुराहो जैसे कई मंदिरों में महाशिवरात्रि पर वार्षिक नृत्य उत्सव (नाट्यंजलि) होते थे, जो इस पर्व के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाते हैं।
महाशिवरात्रि व्रत के नियम :

महाशिवरात्रि के दिन सूर्योदय से पहले उठें।

पीले रंग के कपड़े धारण करें।

हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर भगवान शिव के सामने व्रत का संकल्प लें।

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों पहर में करना फलदायी होता है।

हर प्रहर में दूध, दही, घी और शहद से शिवलिंग का अभिषेक करें।

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