PAU किसान मेला या ‘सरकारी लूट’ का अड्डा? करोड़ों की वसूली, खस्ताहाल सड़कें और फेल मौसम विभाग—क्या मुख्यमंत्री मान और कृषि मंत्री भी हैं इस ‘कीचड़’ के जिम्मेदार ?

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लुधियाना | विशेष संवाददाता

पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) का बहुचर्चित किसान मेला एक बार फिर विवादों के घेरे में है। कल से शुरू होने वाले इस मेले में जहाँ एक तरफ पंजाब सरकार ‘रंगला पंजाब’ और ‘किसान हित’ के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत घुटनों तक भरे कीचड़ और टूटी सड़कों के रूप में सामने आ रही है। आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन करोड़ों की वसूली कर अपनी तिजोरियाँ भर रहा है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर सिर्फ बदहाली परोसी जा रही है।

करोड़ों का निवेश और तंबुओं का खेल: क्या मंत्री जी को खबर है?

यूनिवर्सिटी ने देश-भर की कृषि कंपनियों से स्टॉल और तंबू (Tent) लगाने के नाम पर करोड़ों रुपये वसूले हैं। हैरानी की बात यह है कि इतनी भारी-भरकम फीस लेने के बावजूद कंपनियों के पास कोई अधिकार नहीं है कि वे अव्यवस्था पर सवाल उठा सकें। सवाल यह है कि पंजाब के कृषि मंत्री इस पर चुप क्यों हैं? क्या सरकार को पता नहीं कि कंपनियों से वसूली गई इस राशि का बड़ा हिस्सा कहाँ गायब हो रहा है? क्यों बिना किसी ‘रिस्क कवर’ के कंपनियों का करोड़ों का निवेश बारिश के भरोसे छोड़ दिया गया?

मुख्यमंत्री से सीधा सवाल: ‘रंगला पंजाब’ या ‘कीचड़ वाला पंजाब’ ?

मुख्यमंत्री भगवंत मान अक्सर मंचों से किसानों की आय दोगुनी करने और आधुनिक तकनीक की बातें करते हैं। लेकिन PAU के अंदरुनी रास्तों का हाल किसी नरक से कम नहीं है। न सड़कों का पैचवर्क (Patchwork) हुआ, न जल निकासी का प्रबंध। क्या मुख्यमंत्री जी को इस बात की खबर है कि जिस मेले का वे उद्घाटन करने आ सकते हैं, वहां किसान और कंपनियां कीचड़ में धक्के खाने को मजबूर हैं? क्या सरकार की नाक के नीचे चल रहे इस ‘वसूली तंत्र’ को मुख्यमंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है?

सफेद हाथी बना ‘मौसम विभाग’: करोड़ों के यंत्रों पर धूल या मिलीभगत ?

PAU के पास अपना करोड़ों की लागत वाला अत्याधुनिक मौसम विभाग (Agro-meteorology) है। जब मोबाइल ऐप्स पर बारिश की सटीक जानकारी मिल जाती है, तो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक हर बार बारिश के दिनों में ही मेला क्यों रखते हैं? क्या यह जानबूझकर किया जाता है ताकि ‘वॉटरप्रूफ टेंट’ के नाम पर ठेकेदारों और अफसरों की मिलीभगत से मलाई काटी जा सके? सरकार इस ‘फेल्योर’ पर चुप्पी क्यों साधे हुए है?

गेट बंद और जनता परेशान: वीआईपी कल्चर का बोलबाला

सुरक्षा के नाम पर कई एंट्री गेट बंद कर दिए गए हैं, जिससे लुधियाना की जनता और दूर-दराज से आए किसानों को भारी परेशानी हो रही है। वीआईपी मूवमेंट के नाम पर आम आदमी को सड़कों पर खदेड़ा जा रहा है।

तीखे सवाल जिनका जवाब सरकार और प्रशासन को देना होगा:

मुख्यमंत्री मान से सवाल: क्या आपकी सरकार में किसानों के नाम पर होने वाली इस करोड़ों की ‘कार्पोरेट वसूली’ की कोई ऑडिट होगी?

कृषि मंत्री से सवाल: कंपनियों से वसूले गए करोड़ों रुपये में से सड़कों की मरम्मत पर एक पैसा क्यों नहीं खर्च हुआ?

यूनिवर्सिटी प्रशासन से सवाल: जब बारिश का पता था, तो तारीखें क्यों नहीं बदली गईं? क्या यह ठेकेदारों को फायदा पहुँचाने की साजिश है?

निष्कर्ष:
PAU का यह मेला अब खेती की तकनीक सिखाने से ज्यादा ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘सरकारी वसूली’ का जरिया बन चुका है। अगर कल बारिश हुई और करोड़ों की मशीनरी बर्बाद हुई, तो क्या मुख्यमंत्री इसकी जिम्मेदारी लेंगे या फिर ‘कुदरत का कहर’ बताकर हमेशा की तरह पल्ला झाड़ लिया जाएगा?

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