जीत समाचार एक्सक्लूसिव: शहीद के नाम पर राजनीति, करोड़ों के विज्ञापनों से पंजाबी भाषा का कत्ल!

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लुधियाना: (कमल पवार)

आज शहर में ‘शहीद-ए-आजम भगत सिंह नेशनल मैराथन’ (प्रो-रन) का आयोजन बड़े तामझाम के साथ किया गया। लेकिन नशे के खिलाफ इस “दौड़” में प्रशासन खुद अपनी ही सरकार के कायदे-कानूनों से पीछे छूट गया। पंजाब सरकार के पंजाबी भाषा को प्राथमिकता देने वाले दावों की धज्जियां उड़ाते हुए पूरे शहर में ऐसे होर्डिंग्स लगाए गए, जिनमें पंजाबी को हाशिए पर धकेल दिया गया है।

डीसी की ‘अंग्रेजी’ दौड़: जिला प्रशासन द्वारा जारी किए गए मुख्य पोस्टरों में पूरी जानकारी अंग्रेजी में भरी गई है। पंजाब सरकार का सख्त आदेश है कि हर बोर्ड पर पंजाबी

(गुरुमुखी) सबसे ऊपर होनी चाहिए, लेकिन यहाँ तो पंजाबी को “नन्हे अक्षरों” में समेट

दिया गया है। सवाल यह है कि क्या डीसी साहब को पंजाब के आम आदमी से ज्यादा ‘अंगरेज’ मेहमानों की चिंता थी?

करोड़ों की बर्बादी, रस्म अदायगी की पंजाबी: शहर के चप्पे-चप्पे पर हजारों पोस्टर और सैकड़ों विशाल होर्डिंग्स लगाए गए हैं। सूत्रों की मानें तो केवल विज्ञापन और ब्रांडिंग पर लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए हैं। जनता का

सवाल है कि जिस भाषा के नाम पर सरकार बनी, उसी भाषा के लिए विज्ञापन बजट में जगह क्यों नहीं मिली?

छुट्टी के दिन बच्चों की ‘परेशानी’: खबर तो यह भी है कि भीड़ जुटाने के लिए जिला शिक्षा कार्यालय ने महाशिवरात्रि के सरकारी अवकाश के बावजूद स्कूली बच्चों को सुबह 6 बजे स्टेडियम पहुँचने का फरमान सुना दिया। श्रद्धालुओं के

त्यौहार के बीच प्रशासन की इस “जबरदस्ती” ने लोगों में भारी रोष पैदा कर दिया है।

नशा मुक्ति या फोटो खिंचवाना ?: शहीद भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल कर प्रशासन ने इवेंट तो भव्य बना लिया, लेकिन करोड़ों रुपये के टेंट और स्टेज पर खर्च करने के बजाय यदि यह पैसा नशा मुक्ति केंद्रों पर लगाया जाता, तो

शायद शहीद की आत्मा को ज्यादा शांति मिलती।

जीत समाचार का तीखा सवाल: क्या लुधियाना प्रशासन खुद को पंजाब सरकार के नियमों से ऊपर मानता है? आम जनता से भारी-भरकम चालान काटने वाले अधिकारी अपनी ही गलती पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?

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