आभासी दुनिया का असली सच और डगमगाता मानसिक स्वास्थ्य

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आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारी जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुबह की पहली किरण देखने से पहले स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उंगलियों का थिरकना एक सामान्य प्रक्रिया बन गई है। सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान और मनोरंजन के लिहाज से यह एक क्रांतिकारी बदलाव है, लेकिन इसके पीछे छिपा ‘मानसिक अवसाद’ का अंधेरा अब चिंता का विषय बन गया है।

सोशल मीडिया के मंचों पर परोसी जाने वाली ‘परफेक्ट लाइफ’ की तस्वीरें और वीडियो असल में एक आभासी भ्रम पैदा कर रहे हैं। विशेषकर युवाओं में, दूसरों की चमक-धमक वाली जिंदगी से अपनी तुलना करने की होड़ ने ‘हीन भावना’ (Inferiority Complex) को जन्म दिया है। लाइक्स और कमेंट्स की संख्या अब किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास का पैमाना बन गई है। जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, तो व्यक्ति एकाकीप…
डिग्री की भीड़ में खोता ‘इंसान’ और शिक्षा का असली ध्येय

आधुनिक दौर में हमने शिक्षा को सफलता की सीढ़ी तो बना लिया है, लेकिन क्या हम इसे जीवन की नींव बना पाए हैं? यह सवाल आज के शैक्षणिक परिदृश्य में कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। हाल के वर्षों में हमने देखा है कि हमारे शिक्षण संस्थान बेहतरीन इंजीनियर, डॉक्टर और प्रबंधक तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन ‘सेंसिटिव ह्यूमन’ यानी संवेदनशील इंसान बनाने की दौड़ में हम पिछड़ते जा रहे हैं।

आज की शिक्षा प्रणाली ‘ग्रेड्स’ और ‘पैकेज’ के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में छात्र पाठ्यपुस्तकों को तो रट रहे हैं, लेकिन जीवन के मूल्यों—जैसे सहानुभूति, धैर्य और ईमानदारी—से उनका परिचय धुंधला होता जा रहा है। विडंबना यह है कि उच्च शिक्षित होने के बावजूद समाज में अपराध, असहिष्णुता और मानसिक तनाव की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। क्या हमें यह सोचने की ज़रूरत नहीं है कि जिस ज्ञान में ‘संस्कार’ की कमी हो, वह समाज के लिए वरदान है या अभिशाप?

शिक्षा का अर्थ केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए। प्राचीन काल में शिक्षा का उद्देश्य ‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विद्या वही जो मुक्त करे) माना जाता था—यानी वह ज्ञान जो हमें संकीर्णताओं से मुक्त कर सके। परंतु आज हम तकनीक में तो निपुण हो गए हैं, लेकिन संवाद की कला और रिश्तों की गर्माहट को भूलते जा रहे हैं।

समय आ गया है कि शिक्षा नीति में केवल ‘स्किल सेट’ पर ही नहीं, बल्कि ‘मोरल सेट’ पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए। स्कूलों में नैतिक शिक्षा को केवल एक वैकल्पिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति के रूप में शामिल करना होगा। यदि भविष्य की पीढ़ी के पास ज्ञान की शक्ति तो हो, लेकिन विवेक का अंकुश न हो, तो वह शक्ति विध्वंसक साबित हो सकती है। अंततः, एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण केवल ऊंचे भवनों और बड़ी अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि उच्च चरित्र वाले नागरिकों से होता है।

कमल की कलम

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