कंक्रीट के जंगल में बढ़ता अकेलापन: जब भीड़ ही बन जाए बोझ

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दैनिक जीत समाचार

आज के दौर में हमारे शहर गगनचुंबी इमारतों और चमकती रोशनी से जगमगा रहे हैं, लेकिन इन रोशनियों के पीछे एक गहरी खामोशी पसरती जा रही है। आधुनिक महानगरीय संस्कृति ने हमें भौतिक समृद्धि तो दी है, लेकिन बदले में हमारा ‘सामाजिक अपनत्व’ छीन लिया है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज हम हज़ारों की भीड़ के बीच रहकर भी खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं।

पुराने समय में मोहल्ले और गलियां आपसी संवाद का केंद्र हुआ करती थीं, जहाँ दुख-सुख साझा करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। आज ‘फ्लैट कल्चर’ ने हमें अपनी ही दीवारों के भीतर कैद कर दिया है। पड़ोस के घर में कौन रहता है, यह जानने की फुर्सत भी अब किसी के पास नहीं है। प्राइवेसी (निजता) की चाहत धीरे-धीरे आइसोलेशन (अलगाव) में तब्दील हो गई है। विडंबना देखिए कि हम पूरी दुनिया से इंटरनेट के जरिए जुड़े हैं, लेकिन बगल वाले कमरे में बैठे सदस्य से बात करने के लिए समय की कमी है।

यह बढ़ता अकेलापन केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट भी बनता जा रहा है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, सामाजिक अलगाव के कारण युवाओं और बुजुर्गों में अवसाद (Depression) और एंग्जायटी के मामले रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गए हैं। जब इंसान के पास अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का कोई जीवंत मंच नहीं बचता, तो वह भीतर ही भीतर टूटने लगता है। डिजिटल ‘हाय-हैलो’ कभी भी आमने-सामने की हंसी और सहानुभूति का स्थान नहीं ले सकती।

हमें यह समझना होगा कि विकास का पैमाना केवल प्रति व्यक्ति आय या सड़कों का जाल नहीं हो सकता। एक स्वस्थ समाज वह है जहाँ लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हों। सामुदायिक केंद्रों की वापसी, सामूहिक त्योहारों का उत्साह और पड़ोसियों के साथ छोटा सा संवाद इस दिशा में बड़े कदम हो सकते हैं। तकनीक के इस युग में हमें ‘मानवीय स्पर्श’ को फिर से खोजने की ज़रूरत है, वरना हम कंक्रीट के ऐसे जंगलों में तब्दील हो जाएंगे जहाँ धड़कनें तो होंगी, पर संवेदनशीलता नहीं।

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