सत्ता और प्रभाव के पद पर बैठे लोगों में अहंकार या घमंड का आना एक जटिल मानवीय प्रवृत्ति है

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शिमला। 07 फरवरी 2026 : सतीश शर्मा
धार्मिक गद्दी या ऊंचे आध्यात्मिक पदों पर बैठे लोगों में घमंड या अहंकार आने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और व्यवहारिक कारण होते हैं। हालांकि यह सभी पर लागू नहीं होता, लेकिन कुछ मामलों में यह एक गंभीर समस्या बन जाती है।
इसके प्रमुख कारण इस प्रकार हैं: 

सत्ता और प्रभाव का नशा : 

धार्मिक गुरुओं के पास अक्सर अनुयायियों (followers) की एक बड़ी भीड़ होती है जो उनकी हर बात को पत्थर की लकीर मानती है। यह असीमित शक्ति और प्रभाव कभी-कभी उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि वे आम लोगों से बेहतर या ऊंचे हैं।

आत्म-धार्मिकता का भाव :

यह धारणा कि वे ईश्वर के ज्यादा करीब हैं या उन्होंने उच्च आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, एक “सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स” (श्रेष्ठता की भावना) पैदा कर सकती है। इस कारण वे खुद को दूसरों से

अधिक धार्मिक और पवित्र मानने लगते हैं।

जवाबदेही का अभाव

 जो नेता अपने संगठन में सर्वोच्च होते हैं और जिनके कार्यों पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं होता, वे अक्सर घमंडी हो जाते हैं। वे खुद को किसी भी नियम या आलोचना से ऊपर समझने लगते हैं।

अनुयायियों द्वारा अत्यधिक महिमामंडन :

 जब लोग किसी गुरु को ईश्वर का दर्जा देने लगते हैं या उन पर अंधविश्वास करते हैं, तो यह सीधे उनके अहंकार को बढ़ावा देता है। अनुयायियों का  हर बात पर तारीफ  उन्हें

वास्तविकता से दूर कर देता है।

आध्यात्मिक अहंकार : 

यह एक सूक्ष्म रूप है, जहाँ गुरु यह मानने लगता है कि उसकी साधना या तपस्या दूसरों से श्रेष्ठ है। वे दूसरों की धार्मिक प्रक्रियाओं को कमतर समझने लगते हैं।

सुरक्षा और ऐशो-आराम: 

उच्च पदों पर मिलने वाली भौतिक सुख-सुविधाएं, मान-सम्मान और चकाचौंध भी इंसान को जमीनी हकीकत से दूर कर सकती है, जिससे घमंड पैदा होता है।

सार रूप में:
जब धार्मिक पद ‘सेवा’ का माध्यम न रहकर ‘सत्ता’ का माध्यम बन जाता है, तब अहंकार का जन्म होता है। शास्त्रों में भी यह उल्लेख है कि अहंकार भक्ति को नष्ट कर देता है।

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