मंदिरों में VIP दर्शन का क्या मामला है ?

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VIP दर्शन का मामला उन्ही मंदिरो में बनता है जहाँ अपार भीड़ उमड़ती है और लोगो को मात्र एक दो क्षण के दर्शन के लिए घंटो लाइन में लगना

 पड़ता है। लोग मंदिर के प्रबंधन पर VIP दर्शन के बहाने ईश्वर के व्यापारीकरण का आरोप लगाते हैं।
1 किसी छोटे सामान्य मंदिर में आपको vip दर्शन की प्रथा नहीं मिलेगी।
 1 अब आप खुद ही सोंचो आप यदि ऐसे किसी मंदिर के प्रबंधन में होंगे और आपके सामने कोई बड़ा नेता या प्रभावशाली व्यक्ति आ जाए
जिसकीसुरक्षा में ही सैकड़ो लोग लगे हों तो क्या आप उन सब से यही कहोगे  कि कृपया सामान्य लाइन में लगें 5 -6 घंटे धक्के खाएं। फिर आधे सेकेण्ड के लिए 200 मिटेर दूर से भगवान् का दर्शन कर
चलते बनें ?  क्या ऐसा कर पाना आपके लिए संभव होगा?
2 मंदिर प्रबंधन की नीतियां जिम्मेदार हैं:
    मंदिरों में राजनेताओं (राजनीतिक लोगों) और सरकारी स्टाफ द्वारा VIP दर्शन किए जाने के पीछे मुख्य रूप से सुरक्षा प्रोटोकॉल, प्रशासनिक सुविधा, और मंदिर प्रबंधन की नीतियां जिम्मेदार हैं।
3 सिर्फ इन लोगों के लिए VIP दर्शन बने होते हैं

उच्च-स्तरीय राजनेताओं (जैसे मुख्यमंत्री, मंत्री,आईएएस .पीसीएस) के साथ सुरक्षा कर्मी  होते हैं।आम कतार में जाने से सुरक्षा को

खतरा हो सकता है और आम जनता को भी दिक्कत हो सकती है। इसलिए, उन्हें अलग से प्रवेश दिया जाता है।

4 मंदिरों में VIP दर्शन का मामला

1  खासतौर पर उन भक्तों के लिए होता है जो विशेष दर्जे के तहत अधिक सुविधाएं और प्राथमिकता चाहते हैं। VIP दर्शन के

दौरान भक्तों को आम दर्शन से अलग, कम समय में और अधिक आरामदायक तरीके से दर्शन करने की सुविधा मिलती है। यह

सुविधा आमतौर पर धन, प्रसिद्धि या किसी विशेष सामाजिक स्थिति वाले व्यक्तियों को दी जाती है।

 

5 इस व्यवस्था की आलोचना:

 

1 हालांकि, इस वीआईपी संस्कृति (VIP Culture) की काफी आलोचना भी होती है।  हाई कोर्ट जैसी अदालतों ने कहा है कि “ईश्वर के सामने सब

बराबर हैं”  VIP दर्शन को केवल संवैधानिक पदों (जैसे राष्ट्रपति, पीएम, सीएम) तक ही सीमित किया जाना चाहिए, न कि स्टाफ के लिए। यह भी

माना जाता है कि इससे आम भक्तों को असुविधा होती है।

6 राजनीतिक रसूख और सिफारिश :

1 अक्सर सिफारिश (Recommendation Letters) के आधार पर नेताओं और अधिकारियों को वीआईपी दर्शन कराया जाता है।

7 सुप्रीम कोर्ट का रुख:
1 सुप्रीम कोर्ट ने वीआईपी दर्शन की प्रथा को “मनमाना” कहा है, लेकिन साथ ही यह भी माना है कि इस पर अंतिम फैसला मंदिर प्रशासन को करना चाहिए।कोर्ट ने यह भी कहा है कि “भगवान के
    मंदिरों  के सामने कोई वीआईपी नहीं है”। इसके बावजूद, भीड़ प्रबंधन के नाम पर यह प्रक्रिया जारी रहती है।
8 निष्कर्ष:
 वीआईपी दर्शन मुख्य रूप से सुरक्षा, समय की कमी और प्रभावशाली लोगों के रसूख के कारण होता है।हालांकि, यह आम जनता में असमानता की भावना पैदा करता है और कई बार विवाद का कारण
  बनता है
9 मंदिर का स्टाफ कैसे बनता है लोगों को वीआईपी

1 प्रमुख राजनेताओं, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, या मंदिर ट्रस्ट के सदस्यों की सिफारिशी  पर  सीधे वीआईपी दर्शन की अनुमति देता है। कई

बड़े मंदिर (जैसे तिरुपति, शिर्डी) 500 से 10,000 रुपये या उससे अधिक के दान के बदले ‘स्पेशल एंट्री’ या ‘वीआईपी ब्रेक दर्शन’ की टिकट जारी

करते हैं, जो सीधे तौर पर मंदिर के कोष में जाती है। वीआईपी को अलग रास्ते (जैसे सुपदम) से ले जाकर कम समय में दर्शन कराए जाते हैं।

10 आम श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी शिकायत यह है
1 कि धर्मस्थल पर अमीर-गरीब, आम-खास का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि भगवान के दरबार में सभी एक समान हैं। वीआईपी के आने पर आम कतारों को घंटों रोक दिया जाता है,
  जिससे आम श्रद्धालुओं को कड़ी धूप और अव्यवस्था का सामना करना पड़ता है।आलोचकों का मानना है कि यह व्यवस्था पैसे से भगवान के दर्शन ‘खरीदने’ जैसी है, जो सही नहीं है।
 कई श्रद्धालु वीआईपी संस्कृति को अनुचित मानते हैं और कहते हैं कि इससे आम आदमी की आस्था को ठेस पहुँचती है जब वे वीआईपी को बिना संघर्ष के दर्शन करते देखते हैं।

 

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