42 वर्षों की ख़ामोशी को तोड़ेगी गुरबाणी — होंद चिल्लड़ की खून से सनी धरती फिर मांगेगी इंसाफ़
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जहां मासूम बच्चों को दीवारों से पटक कर मारा गया, बुज़ुर्गों को ज़िंदा जलाया गया — उसी जगह 3 फ़रवरी को शहीदों की अरदास होगी
लुधियाना: 30 जनवरी 2026 (यादविंदर) )

होंद चिल्लड़… एक ऐसा नाम जो आज भी सिख कौम की रूह को कंपा देता है। वह धरती जहां 1984 के नरसंहार के दौरान 32 निर्दोष सिखों को बेरहमी से पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया गया। 2 साल के मासूम बच्चों से लेकर 70 साल तक के बुज़ुर्गों तक — किसी को भी नहीं बख़्शा गया।उसी खून से रंगी धरती पर 3 फ़रवरी को सुबह 10 बजे शहीदों की याद में गुरबाणी का पाठ और अरदास की जाएगी। 42 वर्षों बाद भी जब इंसाफ़ नहीं मिला, तो अब गुरबाणी की आवाज़ के ज़रिये ज़मीरों को जगाने की कोशिश की जा रही है।
पत्रकारों से बातचीत करते हुए
पायल हलके से विधायक और होंद चिल्लड़ तालमेल कमेटी के प्रधान इंजीनियर मनविंदर सिंह ग्यासपुरा ने भर्राए गले से कहा कि होंद चिल्लड़ वह जगह है जहां भीड़ ने 2 साल के मासूम बच्चे को दीवार से पटक-पटक कर मार डाला था, जहां 70 साल के बुज़ुर्गों को भी नहीं बख़्शा गया और उन पर तेल डालकर ज़िंदा जला दिया गया। उन्होंने कहा कि ये सिर्फ़ हत्याएं नहीं थीं, यह इंसानियत की हत्या थी।
ग्यासपुरा ने दर्द साझा करते हुए कहा
कि 42 साल बीत जाने के बावजूद आज तक अदालतों से सिर्फ़ तारीख़ें ही मिली हैं। न दोषियों को सज़ा मिली, न ही शहीदों की आत्माओं को सुकून। उन्होंने कहा कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की ख़ामोशी, कांग्रेस का खूनी पंजा और भाजपा का दोहरा चेहरा — तीनों ही इंसाफ़ के रास्ते में रुकावट बने हुए हैं।
उन्होंने ऐलान किया
कि इस कार्यक्रम के दौरान उन सभी स्थानों को लोगों के सामने लाया जाएगा जहां दरिंदगी ने सारी हदें पार कीं — वह दीवार, जहां मासूम बच्चे की जान ली गई, और वह जगह जहां बुज़ुर्गों को आग के हवाले किया गया। यह सब लोगों को दिखाकर अदालतों और सत्ता में बैठे लोगों के ज़मीर को झकझोरने की कोशिश की जाएगी।
ग्यासपुरा ने कहा कि शहीदों के समक्ष गुरबाणी पाठ और अरदास कर इंसाफ़ की आवाज़ को और बुलंद किया जाएगा। इसके साथ ही इंसाफ़ न देने वालों और भाजपा के ख़िलाफ़ विरोध स्वरूप पुतला दहन भी किया जाएगा।
उन्होंने कहा,
हम सवाल पूछेंगे क्या यही आज़ाद भारत है? जहां मासूमों के क़ातिल आज भी आज़ाद घूम रहे हैं और शहीदों के वारिस आज भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं।”होंद चिल्लड़ का यह कार्यक्रम सिर्फ़ एक स्मृति नहीं, बल्कि 42 वर्षों से दबी हुई चीख़ का ऐलान होगा — इंसाफ़ लेकर रहने की कसम।
