विशेष रिपोर्ट: सरकारी दफ्तरों में अब ‘मुफ्त की बिजली’ पर ताला, अधिकारियों की ऐयाशी पर चला PSPCL का चाबुक

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लुधियाना:10 फरवरी (दिनेश कुमार शर्मा) 

पंजाब के सरकारी दफ्तरों में अब वो दिन हवा हुए जब सरकारी खजाने की बिजली पर अफसरों की निजी सुख-सुविधाएं चलती थीं। पंजाब सरकार और PSPCL ने 15 फरवरी से प्रीपेड मीटर अनिवार्य करके उन अधिकारियों की नींद उड़ा दी है जो दफ्तर को अपना ‘दूसरा घर’ समझकर बिजली लुटाते थे।

हीटर पर रोटियां और इंडक्शन पर चाय: अब हर यूनिट का हिसाब होगा

सरकारी दफ्तरों के गलियारों में यह चर्चा आम है कि कई बड़े साहब और कर्मचारी सर्दियों में भारी-भरकम हीटर लगाकर बैठते हैं और दोपहर के वक्त इंडक्शन चूल्हों पर चाय बनती है या घर से लाया खाना गर्म होता है। इतना ही नहीं, कई दफ्तरों में तो नियमों को ताक पर रखकर निजी तौर पर बिजली का इस्तेमाल होता था। अब प्रीपेड मीटर लगने से यह ‘अघोषित दावत’ बंद होगी। जैसे ही बजट खत्म होगा, इंडक्शन के साथ-साथ साहब के दफ्तर की लाइट भी गुल हो जाएगी।

साहब की ‘साहबी’ पर लगा लगाम

अब तक सरकारी दफ्तरों में बिजली बिल का कोई डर नहीं था, क्योंकि बिल महीनों तक पेंडिंग रहते थे और भुगतान सरकार को करना होता था। लेकिन अब:

हीटर और AC का बेतहाशा इस्तेमाल: अब अधिकारियों को एसी और हीटर चलाने से पहले मीटर का बैलेंस देखना होगा।

निजी काम के लिए बिजली: दफ्तर में मोबाइल, लैपटॉप या अन्य गैजेट्स की चार्जिंग और निजी चूल्हों का इस्तेमाल अब सीधे विभाग के बजट पर भारी पड़ेगा।

जवाबदेही तय: अगर महीने के बीच में बिजली कटी, तो नोडल अफसर को जवाब देना होगा कि बजट समय से पहले कैसे खत्म हुआ।

जनता के पैसे की बर्बादी पर प्रहार ?

विपक्ष और जानकारों का कहना है कि यह कदम उन अधिकारियों के खिलाफ एक बड़ा प्रहार है जो जनता के टैक्स के पैसे को अपनी ऐयाशी में फूंक रहे थे। लुधियाना के कई दफ्तरों में तो मीटर की क्षमता से कहीं ज्यादा लोड सिर्फ इसलिए बढ़ जाता था क्योंकि वहां अवैध रूप से भारी उपकरण चलते थे। अब प्रीपेड सिस्टम इन ‘बिजली चोर’ प्रवृत्तियों पर नकेल कसेगा।

अधिकारियों में हड़कंप: बजट प्रबंधन की चुनौती

इस नए फरमान से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप है। अधिकारियों को डर है कि अगर सर्दियों में हीटर चलाने के चक्कर में महीने के आखिरी हफ्ते में बजट खत्म हो गया, तो दफ्तर का जरूरी कामकाज कैसे चलेगा? सरकार ने साफ कर दिया है— “जितना पैसा, उतनी बिजली।” अब देखना यह होगा कि क्या सरकारी बाबू अपनी पुरानी आदतें बदलेंगे या अंधेरे में काम करेंगे।

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