लुधियाना का ‘कचरा कांड’: ₹1200 करोड़ के प्रोजेक्ट में फंसा 95 वार्डों का भविष्य, क्या निजी हाथों में जाने से चमकेगा शहर ?
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विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: लुधियाना
लुधियाना:10 फरवरी (दिनेश कुमार शर्मा)

पंजाब का सबसे बड़ा औद्योगिक महानगर ‘मैनचेस्टर ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाला लुधियाना इस समय कूड़े के ढेर और करोड़ों के नए टेंडर के बीच फंसा हुआ है। लुधियाना नगर निगम (MC) ने हाल ही में ₹1,200 करोड़ के इंटीग्रेटेड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (ISWM) प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है, लेकिन यह प्रोजेक्ट शहर को साफ करने से ज्यादा विवादों को जन्म दे रहा है।
क्या है असली संकट ?
शहर के 95 वार्डों से रोजाना लगभग 1100 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। वर्तमान में ‘एटूजेड’ कंपनी के जाने के बाद निगम खुद कूड़ा उठाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सड़कों पर लगे ‘सेकेंडरी डंप’ (कूड़े के पहाड़) नगर निगम के दावों की पोल खोल रहे हैं।
निजी बनाम रोजगार का टकराव: लुधियाना नगर निगम के इस फैसले के खिलाफ स्थानीय कूड़ा उठाने वाले (Waste Pickers) लामबंद हो गए हैं। उनका डर है कि बड़ी कंपनी आने के बाद हजारों गरीब परिवारों का रोजगार छिन जाएगा। हालांकि, मेयर और अधिकारियों का दावा है कि इन वर्करों को नई कंपनी के साथ जोड़ा जाएगा, लेकिन जमीन पर कोई लिखित आश्वासन नहीं है।
ताजपुर रोड डंप का बोझ: शहर के कूड़े का मुख्य केंद्र ताजपुर रोड स्थित मुख्य डंप है, जहां कूड़े के पहाड़ को खत्म करने के लिए ‘बायो-रेमेडिएशन’ चल रही है। नई कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती पुराने कूड़े के निपटान और नए कचरे को प्रोसेस करने के बीच तालमेल बिठाना होगा।
यूजर चार्ज की मार: नए प्रोजेक्ट के लागू होते ही घर-घर से कूड़ा उठाने के बदले लिए जाने वाले शुल्क (User Charges) में बढ़ोतरी की संभावना है। स्मार्ट सिटी के नाम पर जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है।
अधिकारियों का पक्ष:निगम कमिश्नर के अनुसार, इस 10-वर्षीय अनुबंध से लुधियाना को अगले 2-3 सालों में पूरी तरह से कूड़ा-मुक्त कर दिया जाएगा और कचरे से बिजली या खाद बनाने की तकनीक पर काम होगा।
लुधियाना की जनता के लिए सवाल:क्या आपको लगता है कि लुधियाना की सफाई व्यवस्था को निजी कंपनी के हवाले करना सही फैसला है, या नगर निगम को अपनी मशीनरी और स्टाफ को मजबूत करना चाहिए था ?
