दफ्तर हमारा है…” | RTA क्लर्क के बयान ने खोली सिस्टम की परतें, ट्रांसफर के बाद भी वापसी पर उठे सवाल
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बंद कमरे में प्राइवेट लोगों से मुलाकात के आरोप | जनता बाहर इंतजार करे, अंदर ‘जरूरी बातें’ | सूत्रों का दावा—ट्रांसफर के बाद भी उसी दफ्तर में वापसी की जांच जरूरी
लुधियाना। 13 अगस्त / कमल पवार
लुधियाना के RTA दफ्तर की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में पारदर्शिता और आम जनता को बेहतर सुविधाएं देने के दावों के बीच अब एक क्लर्क का कथित बयान चर्चा का विषय बन गया है—“दफ्तर हमारा है, हम प्राइवेट व्यक्ति से अंदर जरूरी बात कर रहे हैं।”इस बयान के सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी दफ्तर में किसी कर्मचारी का “दफ्तर हमारा है” कहना क्या सिर्फ गुस्से में निकला वाक्य है या इसके पीछे लंबे समय से उसी कार्यालय में बनी कथित पकड़ की कहानी छिपी है?
बंद दरवाजा, अंदर प्राइवेटआदमी कौन… बाहर भटकती जनता
दफ्तर आने वाले लोगों का आरोप है कि पब्लिक डीलिंग के समय उन्हें बाहर इंतजार करना पड़ता है, जबकि कुछ निजी व्यक्तियों की कथित तौर पर दफ्तर के अंदर पहुंच रहती है। आरोप है कि आम जनता को सही जानकारी देने के बजाय कई बार उन्हें एजेंटों के चक्कर काटने पड़ते हैं।एक वीडियो में सामने आए कथित बयान ने इस पूरे मामले को और चर्चा में ला दिया है। अब सवाल उठ रहा है कि यदि दफ्तर जनता की सेवा के लिए है, तो पब्लिक डीलिंग के समय दरवाजे बंद कर निजी व्यक्तियों से मुलाकात क्यों?
दफ्तर हमारा है”—बयान या सिस्टम पर पकड़ का इशारा?
सूत्रों का दावा है कि संबंधित क्लर्क की लंबे समय से इस दफ्तर में तैनाती और पकड़ को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। आरोप है कि ट्रांसफर होने के बाद भी वह दोबारा इसी कार्यालय में वापस आ जाता है।हालांकि इस दावे की आधिकारिक जांच होना बाकी है, लेकिन क्लर्क के कथित बयान के बाद अब मांग उठ रही है कि संबंधित कर्मचारी की पूरी पोस्टिंग और ट्रांसफर हिस्ट्री सार्वजनिक की जाए।कब ट्रांसफर हुआ? कहां भेजा गया? कितने समय बाद दोबारा इसी दफ्तर में वापसी हुई? और वापसी का आधार क्या था? यदि इन सवालों का जवाब रिकॉर्ड से सामने आता है, तभी साफ होगा कि “दफ्तर हमारा है” वाला बयान आखिर किस आधार पर दिया गया।
एजेंटों की कथित एंट्री पर भी सवाल
दफ्तर पहुंचे लोगों का आरोप है कि आम व्यक्ति को सही गाइडेंस नहीं मिलती, जबकि कथित एजेंटों की दफ्तर के अंदर आसानी से पहुंच रहती है। आरोपों के मुताबिक, लोगों को प्रक्रियाओं में उलझाकर एजेंटों के माध्यम से काम करवाने की स्थिति पैदा की जाती है।
अब उच्च अधिकारियों को जांच करनी चाहिए कि:
1 पब्लिक डीलिंग के दौरान कमरे बंद क्यों किए जाते हैं?
2 निजी व्यक्तियों की दफ्तर के अंदर क्या भूमिका है?
3 क्या आम जनता और एजेंटों के लिए अलग-अलग व्यवस्था चल रही है?
4 संबंधित क्लर्क की पोस्टिंग और ट्रांसफर का पूरा रिकॉर्ड क्या कहता है?
जनरेटर चोरी ने भी बढ़ाए सवाल
RTA कार्यालय से जुड़े जनरेटर चोरी के मामले को लेकर भी प्रशासनिक व्यवस्था सवालों के घेरे में है। मामले में FIR दर्ज होने और पुलिस जांच की बात कही जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा में हुई कथित चूक की विभागीय जिम्मेदारी कब तय होगी?
सबसे बड़ा सवाल—सरकारी दफ्तर जनता का या किसी की ‘निजी जागीर’?
“दफ्तर हमारा है”—यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए बड़ा सवाल बन गया है। यदि कोई कर्मचारी खुद को दफ्तर का मालिक समझकर जनता को बाहर इंतजार करवाता है और निजी व्यक्तियों को प्राथमिकता देता है, तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
‘जीत समाचार’ की मांग
संबंधित क्लर्क की पोस्टिंग और ट्रांसफर हिस्ट्री, पब्लिक डीलिंग के दौरान निजी व्यक्तियों की कथित आवाजाही तथा दफ्तर में आम जनता को हो रही परेशानी की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारी तय कर सख्त कार्रवाई की जाए।
