इतनी बड़ी बिल्डिंग की कंपाउंडिंग फीस सिर्फ ₹50 हजार? अखबार में खबर छपने के बाद जागे अधिकारी!
डेढ़ साल तक बनती रही बिल्डिंग, पहले तैनात इंस्पेक्टरों को क्यों नहीं दिखा निर्माण? जीत समाचार जल्द खोलेगा जिम्मेदारी से जुड़े सवालों की अगली परत!
लुधियाना |21 अक्टूबर 2026 जॉनी/शर्मा
लुधियाना नगर निगम की बिल्डिंग ब्रांच के कारनामों को लेकर उठ रहे सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे। अब जोन-C की एक बिल्डिंग को लेकर चर्चा तेज हो गई है। जीत समाचार ने पहले भी इस बिल्डिंग का मामला प्रमुखता से उठाया था। अब सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस मामले में करीब ₹50,000 जमा होने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इतनी बड़ी बिल्डिंग के मामले में नगर निगम की निर्धारित फीस पूरी जमा हुई है?सबसे बड़ा सवाल—अगर बिल्डिंग की कंपाउंडिंग फीस लाखों में बनती है, तो क्या सिर्फ ₹50,00
अखबार में खबर छपी, तब अधिकारियों को हुआ मामले का पता?
जीत समाचार की ओर से इस बिल्डिंग का मामला उठाए जाने के बाद जब एटीपी, जोन-C से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि बिल्डिंग का चालान काटा गया है और लगभग ₹50,000 जमा होने की जानकारी है।एटीपी के अनुसार, अखबार में खबर प्रकाशित होने के बाद मामला उनके ध्यान में आया और उन्होंने बिल्डिंग इंस्पेक्टर को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए कहा।अब सवाल यह है कि जब बिल्डिंग का निर्माण करीब डेढ़ साल से चल रहा था, तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं हुई? यदि चालान पहले काटा गया था, तो उसके बाद फीस की वसूली और आगे की कार्रवाई की स्थिति क्या रही?
डेढ़ साल तक निर्माण होता रहा, जिम्मेदारी किसकी?
इस मामले में उन बिल्डिंग इंस्पेक्टरों और एटीपी की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए, जो संबंधित अवधि में जोन-C में तैनात रहे।यदि निर्माण के दौरान नियमों का उल्लंघन हुआ, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या बिल्डिंग का निरीक्षण हुआ था? क्या चालान काटने के बाद निर्माण रोकने या बकाया फीस जमा करवाने के लिए कदम उठाए गए? इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों के रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।
सरकारी खजाने को कितना नुकसान? अब सामने आना चाहिए पूरा हिसाब!
जीत समाचार की पड़ताल का मुख्य उद्देश्य सरकारी राजस्व से जुड़े सवालों का जवाब हासिल करना है।यदि निर्धारित कंपाउंडिंग फीस ₹50,000 से अधिक बनती है, तो बाकी राशि कितनी है? क्या कोई अन्य फीस भी बकाया है? क्या बिल्डिंग का नक्शा पास है? और क्या संबंधित निर्माण को नगर निगम के नियमों के अनुसार मंजूरी मिली हुई है?जब तक बिल्डिंग की कुल देय फीस और जमा राशि का आधिकारिक ब्योरा सामने नहीं आता, तब तक सरकारी खजाने को हुए वास्तविक नुकसान का आंकड़ा तय करना संभव नहीं है।इसलिए नगर निगम प्रशासन को चाहिए कि बिल्डिंग का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करे और बकाया राशि होने पर नियमानुसार उसकी वसूली सुनिश्चित करे।
PCS अधिकारी ने दिया जांच का भरोसा
इस मामले को लेकर जब बिल्डिंग ब्रांच के प्रभारी PCS अधिकारी से बातचीत की गई, तो उन्होंने कहा कि मामला उनके ध्यान में लाया गया है। उन्होंने संबंधित बिल्डिंग के सभी दस्तावेज निकलवाकर जांच करवाने और दोषी पाए जाने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही।उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारी से जवाबदेही तय करने के लिए जवाब मांगा जाएगा।अब देखना यह होगा कि जांच में क्या सामने आता है। क्या सिर्फ मौजूदा रिकॉर्ड की जांच होगी या पहले तैनात रहे अधिकारियों की भूमिका भी खंगाली जाएगी?
अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
अब निगाहें नगर निगम प्रशासन की जांच पर टिकी हैं। क्या संबंधित बिल्डिंग की फीस का पूरा हिसाब सामने आएगा? क्या बकाया राशि की वसूली होगी? क्या पहले तैनात अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाएगी?इन सभी सवालों का जवाब आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा।जीत समाचार का उद्देश्य किसी को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं, बल्कि सरकारी राजस्व की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करवाना है।जनता के पैसे से चलने वाले सरकारी खजाने में यदि कोई राशि बकाया है, तो उसकी वसूली होनी चाहिए। यदि किसी कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
अब देखना है—जांच चलेगी या मामला फाइलों में दबेगा?
जोन-C की इस बिल्डिंग ने नगर निगम की निगरानी व्यवस्था और राजस्व वसूली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब गेंद नगर निगम प्रशासन के पाले में है। जांच में यदि फीस बकाया पाई जाती है, तो नियमानुसार वसूली होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
जीत समाचार का मकसद किसी को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जिनका जवाब जनता और सरकारी खजाने के हित में जरूरी है।
जीत समाचार की अगली पड़ताल में इस बिल्डिंग की फीस, चालान और जिम्मेदारी से जुड़े सवालों पर नजर रहेगी। क्योंकि सवाल सिर्फ ₹50 हजार का नहीं—सवाल है सरकारी राजस्व की सुरक्षा और अधिकारियों की जवाबदेही का!

